Tuesday, May 11, 2010

........मुझे बेर के पेड़ के निचे बिठाने के बाद उन लोगो ने मुझेसे मेरा नाम पूछा मैंने धीरे से रोते हुवे बताया विवेक। फिर उन लोगो ने मुझसे मेरे दादा जी का नाम पूछा मैंने बताया । वे तिन थे ,फिर उन लोगो ने रोड की और देखा गावं के कुछ लोग अभी भी रोड पर थे ,कुछ लोगो ने एक दो फैर भी किया ,चुकी उन दिनों मेरे गावं के अधिकांस लोग लिसेंस बंधूक या कट्टा रखते थे । वे लोग आपस में बातें करते रहे रात गहरी होती गयी ,गावं के लोग भी सर्ड्क पर से वापस अपने घरो में चले गए । उन लोगो ने मुझसे बैठे रहने को कह कर खुद को खेतो के फसल में छुपाते हुवे वह से भाग गए । थोड़ी देर तक चुप चाप बैठे रहने के बाद मै अपने हाथो को खोलना सुरु किया और फिर थोड़ी देर में अपने हाथो को खोलने के बाद अपने पैरो को भी खोला ,और वहा से सीधे अपने घर की और भागा सर्ड्क पर अब कोई नहीं था । मै चुप चाप अपने घर की और चला । सर्ड्क से मेरा घर नजदीक ही है । मै अपने घर के सामने जब पंहुचा तो दादाजी को घर से बहार आते हुवे देखा । मै दौढ़ कर उनके पास पंहुचा और उनसे लिपट कर रोने लगा । घर गया वहा भी सभी रो रहे थे । सब ने रहत की साँस ली । मैंने रात में सिर्फ धुध पिया और सो गया । सुबह का नजर कुछ और था , गावं के बहुत से लोग मुझे देखने आये हुवे थे ,पुलिश भी आई पर मै किडनापर क्र बारे में कुछ भी नहीं बता पाया । सबने अपने मुह पर कपडा बंधा हुवा था ,पुलिश चली गयी ,गावं वाले चले गए ,मै अपने घर में था ,सभी खुस थे ।

2 comments:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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