Monday, March 31, 2014

kya tumne kabhi ye dekha hai ?

क्या तुमने  कभी ये देखा है ,

कैसे सुरज उगता है ,

कैसे बादल  बरसते है ,

कैसे नदियाँ बहती है ,

ये हवा कहा से चलती है ,

क्या तुमने कभी पीले सरसो के फूलो पर ,
भौरो  को गुनगुनाते देखा है .



Monday, November 12, 2012

kya sochta hai?

ऐ मेरे मन क्या सोचता है ,
 क्यों आज तू इतना उदास है ,
क्यों आज तू इतना निराश है ,
क्या बात है ,
क्यों तू इतना हताश है ,
कौन  सा मंजिल छुट गया ?
या रास्ते में ही है तू टूट गया !
 क्यों है ऐसा सोचता ,
"की तू है पीछे छुट गया"
तू राम कृष्ण और बुद्ध नहीं है ,
गुरु गोविन्द का शिष्य नहीं है ,
चिंता मत कर चिंतन कर तू और बस अपना तू कर्म किये जा ,
इस दुनिया को जी भर के जिए जा ,
हर नये सवेरे को तू अपना बना ,
 ऐ मेरे मन क्या सोचता है ,
चल एक नई उम्मीद से एक नए विशवाश से ,
ऐ मेरे मन मेरे साथ तू चल,
 तेरी मंजिल का पता मै  बतलाता हूँ ,
तू बस उस पथ पर चला चल। ऐ मेरे मन क्या सोचता है।

Thursday, July 22, 2010

अनकही बाते


मै मिलना चाहता हूँ , उन यादों से जिनमे बचपन की कुछ बाते हैं ,

कुछ यादें है कुछ वादें हैं

अपने दोस्तों से अपने खेतो से अपने खलिहानों से जो किया था मैंने कभी उनसे ,

जो आज भी अधूरे हैं।

मै मिलना चाहता हूँ ,

उन गली मोहल्लो से खेतो की पगडंडियो से और गावँ के उस स्कुल से ,

जहाँ सिखा था लिखने का ज्ञान कभी ।

मै मिलना चाहता हूँ उन बनबेर के झुर्मुठो से ,

उन जंगली आम के पेडों से जो अपने से थे कभी अपने नहीं है अभी।
मै मिलना चाहता हूँ उन यादों से ।

मेरी पहली कविता


अपने बचपन के झुरमुट से लेकर आया हु ,

कुछ मीठे फल कुछ खटे फल

बन बेरो के जैसे फल

कुछ फुल भी है :

महकाते है जो मेरे मन को

मेरे जीवन को

मेरे बचपन की यादो को सजाती

मेरे मन की मेरी यादें ।



Saturday, June 5, 2010

sukriya

मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए ब्लॉग जगत का धन्यवाद ।

Tuesday, May 11, 2010

........मुझे बेर के पेड़ के निचे बिठाने के बाद उन लोगो ने मुझेसे मेरा नाम पूछा मैंने धीरे से रोते हुवे बताया विवेक। फिर उन लोगो ने मुझसे मेरे दादा जी का नाम पूछा मैंने बताया । वे तिन थे ,फिर उन लोगो ने रोड की और देखा गावं के कुछ लोग अभी भी रोड पर थे ,कुछ लोगो ने एक दो फैर भी किया ,चुकी उन दिनों मेरे गावं के अधिकांस लोग लिसेंस बंधूक या कट्टा रखते थे । वे लोग आपस में बातें करते रहे रात गहरी होती गयी ,गावं के लोग भी सर्ड्क पर से वापस अपने घरो में चले गए । उन लोगो ने मुझसे बैठे रहने को कह कर खुद को खेतो के फसल में छुपाते हुवे वह से भाग गए । थोड़ी देर तक चुप चाप बैठे रहने के बाद मै अपने हाथो को खोलना सुरु किया और फिर थोड़ी देर में अपने हाथो को खोलने के बाद अपने पैरो को भी खोला ,और वहा से सीधे अपने घर की और भागा सर्ड्क पर अब कोई नहीं था । मै चुप चाप अपने घर की और चला । सर्ड्क से मेरा घर नजदीक ही है । मै अपने घर के सामने जब पंहुचा तो दादाजी को घर से बहार आते हुवे देखा । मै दौढ़ कर उनके पास पंहुचा और उनसे लिपट कर रोने लगा । घर गया वहा भी सभी रो रहे थे । सब ने रहत की साँस ली । मैंने रात में सिर्फ धुध पिया और सो गया । सुबह का नजर कुछ और था , गावं के बहुत से लोग मुझे देखने आये हुवे थे ,पुलिश भी आई पर मै किडनापर क्र बारे में कुछ भी नहीं बता पाया । सबने अपने मुह पर कपडा बंधा हुवा था ,पुलिश चली गयी ,गावं वाले चले गए ,मै अपने घर में था ,सभी खुस थे ।