Saturday, September 23, 2017


इक पौधा नन्हा सा पौधा।
था मेरे साथ जो बड़ा हुआ
अपने नन्हे हाथो से मैंने
जिसे बड़े जतन लगाया था।
अपने बचपन में मेने भी
 एक पेड़ लगाया था


जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ ये भी कुछ ऐसे ही बड़ा हुआ
इसके मीठे फलो ने मेरा मन बड़ा लुभाया था।  
एक पौधा नन्हा सा पौधा 
था मेरे साथ जो बड़ा हुआ।  

Monday, March 31, 2014

kya tumne kabhi ye dekha hai ?

क्या तुमने  कभी ये देखा है ,

कैसे सुरज उगता है ,

कैसे बादल  बरसते है ,

कैसे नदियाँ बहती है ,

ये हवा कहा से चलती है ,

क्या तुमने कभी पीले सरसो के फूलो पर ,
भौरो  को गुनगुनाते देखा है .



Monday, November 12, 2012

kya sochta hai?

ऐ मेरे मन क्या सोचता है ,
 क्यों आज तू इतना उदास है ,
क्यों आज तू इतना निराश है ,
क्या बात है ,
क्यों तू इतना हताश है ,
कौन  सा मंजिल छुट गया ?
या रास्ते में ही है तू टूट गया !
 क्यों है ऐसा सोचता ,
"की तू है पीछे छुट गया"
तू राम कृष्ण और बुद्ध नहीं है ,
गुरु गोविन्द का शिष्य नहीं है ,
चिंता मत कर चिंतन कर तू और बस अपना तू कर्म किये जा ,
इस दुनिया को जी भर के जिए जा ,
हर नये सवेरे को तू अपना बना ,
 ऐ मेरे मन क्या सोचता है ,
चल एक नई उम्मीद से एक नए विशवाश से ,
ऐ मेरे मन मेरे साथ तू चल,
 तेरी मंजिल का पता मै  बतलाता हूँ ,
तू बस उस पथ पर चला चल। ऐ मेरे मन क्या सोचता है।

Thursday, July 22, 2010

अनकही बाते


मै मिलना चाहता हूँ , उन यादों से जिनमे बचपन की कुछ बाते हैं ,

कुछ यादें है कुछ वादें हैं

अपने दोस्तों से अपने खेतो से अपने खलिहानों से जो किया था मैंने कभी उनसे ,

जो आज भी अधूरे हैं।

मै मिलना चाहता हूँ ,

उन गली मोहल्लो से खेतो की पगडंडियो से और गावँ के उस स्कुल से ,

जहाँ सिखा था लिखने का ज्ञान कभी ।

मै मिलना चाहता हूँ उन बनबेर के झुर्मुठो से ,

उन जंगली आम के पेडों से जो अपने से थे कभी अपने नहीं है अभी।
मै मिलना चाहता हूँ उन यादों से ।

मेरी पहली कविता


अपने बचपन के झुरमुट से लेकर आया हु ,

कुछ मीठे फल कुछ खटे फल

बन बेरो के जैसे फल

कुछ फुल भी है :

महकाते है जो मेरे मन को

मेरे जीवन को

मेरे बचपन की यादो को सजाती

मेरे मन की मेरी यादें ।



Saturday, June 5, 2010

sukriya

मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए ब्लॉग जगत का धन्यवाद ।